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बांदा की विशेष अदालत का बड़ा फैसला: 34 बच्चों के शोषण मामले में दंपती को फांसी

कानपूर - उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में विशेष पॉक्सो अदालत ने 34 नाबालिग बच्चों के यौन शोषण और आपत्तिजनक सामग्री तैयार कर उसे विदेशों तक प्रसारित करने के मामले में सख्त रुख अपनाते हुए सिंचाई विभाग के निलंबित जूनियर इंजीनियर रामभवन और उसकी पत्नी दुर्गावती को मृत्युदंड की सजा सुनाई है। अदालत ने तीसरे आरोपी के मामले को अलग रखते हुए उसकी सुनवाई जारी रखने का आदेश दिया है।

विशेष न्यायाधीश प्रदीप कुमार मिश्रा ने अपने विस्तृत फैसले में कहा कि यह अपराध “दुर्लभ से दुर्लभतम” श्रेणी में आता है। न्यायालय ने टिप्पणी की कि दोषियों ने न केवल मासूम बच्चों के साथ अमानवीय व्यवहार किया, बल्कि समाज के नैतिक मूल्यों को भी गहरी ठेस पहुंचाई है। अदालत ने राज्य सरकार को सभी पीड़ित बच्चों को 10-10 लाख रुपये मुआवजा देने और आरोपियों से बरामद धनराशि को भी पीड़ितों में समान रूप से वितरित करने का निर्देश दिया है। साथ ही दोनों पर अलग-अलग धाराओं में लाखों रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है।

इंटरपोल की सूचना से खुला मामला

पूरे मामले का खुलासा तब हुआ जब अंतरराष्ट्रीय एजेंसी इंटरपोल की ओर से दिल्ली स्थित सीबीआई कार्यालय को ई-मेल के माध्यम से सूचना दी गई। इसमें आशंका जताई गई थी कि आरोपी डार्कवेब के जरिये बच्चों से जुड़ी आपत्तिजनक सामग्री विदेशों में साझा कर रहा है। इसके बाद केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने कई महीनों तक तकनीकी और जमीनी स्तर पर जांच की।

16 नवंबर 2020 को सीबीआई ने चित्रकूट स्थित आवास पर छापा मारकर दंपती को गिरफ्तार किया। जांच के दौरान इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, मेमोरी डिवाइस और बड़ी मात्रा में डिजिटल साक्ष्य बरामद किए गए। एजेंसी ने करीब पांच वर्षों तक चली जांच के बाद विस्तृत आरोपपत्र अदालत में दाखिल किया।

बच्चों के बयान से खुली भयावह सच्चाई

अदालत में पेश किए गए साक्ष्यों और पीड़ित बच्चों के बयानों से यह स्पष्ट हुआ कि आरोपियों ने लालच और दबाव का सहारा लेकर कई जिलों के बच्चों को निशाना बनाया। कुछ मामलों में गवाहों को प्रभावित करने और धमकाने की कोशिशें भी सामने आईं।

जांच एजेंसियों के अनुसार, जब्त किए गए डिजिटल उपकरणों में बड़ी संख्या में आपत्तिजनक वीडियो और तस्वीरें मिलीं। इन साक्ष्यों के आधार पर अदालत ने दोनों को दोषी करार दिया।

अदालत की कड़ी टिप्पणी

फैसला सुनाते हुए न्यायालय ने कहा कि सरकारी पद पर रहते हुए इस तरह का अपराध करना समाज के विश्वास के साथ विश्वासघात है। अदालत ने माना कि यदि ऐसे मामलों में कठोर दंड नहीं दिया गया तो यह समाज के लिए गलत संदेश होगा।

दोषियों ने फैसले के खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील करने की बात कही है। फिलहाल दोनों को जेल भेज दिया गया है और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी है।

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